इंद्रिय के द्वारा हमें बाहरी विषयो ka jayan ...by.maan singh
इंद्रिय के द्वारा हमें बाहरी
विषयों - रूप, रस, गंध, स्पर्श एवं
शब्द - का तथा आभ्यंतर विषयों -
सु:ख दु:ख आदि-का ज्ञान प्राप्त
होता है। इद्रियों के अभाव में हम
विषयों का ज्ञान किसी प्रकार
प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए
तर्कभाषा के अनुसार इंद्रिय वह
प्रमेय है जो शरीर से संयुक्त,
अतींद्रिय (इंद्रियों से ग्रहीत न
होनेवाला) तथा ज्ञान का करण
हो (शरीरसंयुक्तं ज्ञानं
करणमतींद्रियम्)।
न्याय के अनुसार इंद्रियाँ दो
प्रकार की होती हैं :
(1) बहिरिंद्रिय - घ्राण, रसना,
चक्षु, त्वक् तथा श्रोत्र (पाँच) और
(2) अंतरिंद्रिय - केवल मन (एक)।
इनमें बाह्य इंद्रियाँ क्रमश: गंध,
रस, रूप स्पर्श तथा शब्द की
उपलब्धि मन के द्वारा होती हैं।
सुख दु:ख आदि भीतरी विषय हैं।
इनकी उपलब्धि मन के द्वारा
होती है। मन हृदय के भीतर
रहनेवाला तथा अणु परमाणु से युक्त
माना जाता है। इंद्रियों की
सत्ता का बोध प्रमाण, अनुमान से
होता है, प्रत्यक्ष से नहीं सांख्य के
अनुसार इंद्रियाँ संख्या में एकादश
मानी जाती हैं जिनमें
ज्ञानेंद्रियाँ तथा कर्मेंद्रियाँ
पाँच पाँच मानी जाती हैं।
ज्ञानेंद्रियाँ पूर्वोक्त पाँच हैं,
कर्मेंद्रियाँ मुख, हाथ, पैर,
मलद्वार तथा जननेंद्रिय हैं जो
क्रमश: बोलने, ग्रहण करने, चलने,
मल त्यागने तथा संतानोत्पादन
का कार्य करती है।
संकल्पविकल्पात्मक मन ग्यारहवीं
इंद्रिय माना जाता है।
छठी इन्द्रिय कैसे जगाये
छठी इंद्री को अंग्रेजी में सिक्स्थ
सेंस कहते हैं। सिक्स्थ सेंस को
जाग्रत करने के लिए योग में अनेक
उपाय बताए गए हैं। इसे
परामनोविज्ञान का विषय भी
माना जाता है। असल में यह संवेदी
बोध का मामला है। गहरे ध्यान
प्रयोग से यह स्वत: ही जाग्रत
हो जाती है।
कहते हैं कि पाँच इंद्रियाँ होती
हैं- नेत्र, नाक, जीभ, कान और
यौन। इसी को दृश्य, सुगंध, स्वाद,
श्रवण और स्पर्श कहा जाता है।
किंतु एक और छठी इंद्री भी होती
है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन
उसका अस्तित्व महसूस होता है।
वह मन का केंद्रबिंदु भी हो सकता
है या भृकुटी के मध्य स्थित आज्ञा
चक्र जहाँ सुषुन्मा नाड़ी स्थित है।
सिक्स्थ सेंस के कई किस्से-
कहानियाँ किताबों में भरे पड़े हैं।
इस ज्ञान पर कई तरह की फिल्में
भी बन चुकी हैं और उपन्यासकारों
ने इस पर उपन्यास भी लिखे हैं।
प्राचीनकाल या मध्यकाल में छठी
इंद्री ज्ञान प्राप्त कई लोग हुआ
करते थे, लेकिन आज कहीं भी दिखाई
नहीं देते तो उसके भी कई कारण हैं।
मेस्मेरिज्म या हिप्नोटिज्म जैसी
अनेक विद्याएँ इस छठी इंद्री के
जाग्रत होने का ही कमाल होता
है। हम आपको बताना चाहते हैं कि
छठी इंद्री क्या होती है और योग
द्वारा इसकी शक्ति कैसे हासिल
की जा सकती है और यह भी कि
जीवन में हम इसका इस्तेमाल किस
तरह कर सकते हैं।
क्या है छठी इंद्री : मस्तिष्क के
भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है,
उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से
सुषुन्मा रीढ़ से होती हुई मूलाधार
तक गई है। सुषुन्मा नाड़ी जुड़ी है
सहस्रकार से।
इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ
स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं
तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र
स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य
स्वर स्थित रहता है। सुषुम्ना मध्य
में स्थित है, अतः जब हमारे दोनों
स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि
सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है। इस
सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस
जाग्रत होता है।
इड़ा, पिंगला और सुषुन्मा के
अलावा पूरे शरीर में हजारों
नाड़ियाँ होती हैं। उक्त सभी
नाड़ियों का शुद्धि और
सशक्तिकरण सिर्फ प्राणायाम और
आसनों से ही होता है। शुद्धि और
सशक्तिकरण के बाद ही उक्त
नाड़ियों की शक्ति को जाग्रत
किया जा सकता है।
ND
छठी इंद्री के जाग्रत होने से क्या
होगा : व्यक्ति में भविष्य में झाँकने
की क्षमता का विकास होता है।
अतीत में जाकर घटना की सच्चाई
का पता लगाया जा सकता है।
मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन
सकते हैं। किसके मन में क्या विचार
चल रहा है इसका शब्दश: पता लग
जाता है। एक ही जगह बैठे हुए
दुनिया की किसी भी जगह की
जानकारी पल में ही हासिल की
जा सकती है। छठी इंद्री प्राप्त
व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह
सकता और इसकी क्षमताओं के
विकास की संभावनाएँ अनंत हैं।
कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री : यह
इंद्री सभी में सुप्तावस्था में होती
है। भृकुटी के मध्य निरंतर और
नियमित ध्यान करते रहने से
आज्ञाचक्र जाग्रत होने लगता है
जो हमारे सिक्स्थ सेंस को बढ़ाता
है। योग में त्राटक और ध्यान की
कई विधियाँ बताई गई हैं। उनमें से
किसी भी एक को चुनकर आप इसका
अभ्यास कर सकते हैं।
शांत-स्वच्छ वातावरण : अभ्यास के
लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और
स्वच्छ वातावरण, जहाँ फेफड़ों में
ताजी हवा भरी जा सके अन्यथा
आगे नहीं बढ़ा जा सकता। शहर का
वातावरण कुछ भी लाभदायक नहीं
है, क्योंकि उसमें शोर, धूल, धुएँ के
अलावा जहरीले पदार्थ और
कार्बन डॉक्साइट निरंतर आपके
शरीर और मन का क्षरण करती
रहती है।
प्राणायाम का अभ्यास :
वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग का
सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा
ही काम करता है। हम ऐसे पोषक
तत्व ग्रहण नहीं करते जो मस्तिष्क
को लाभ पहुँचा सकें, तब
प्राणायाम ही एकमात्र उपाय
बच जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम
जाग्रत करना चाहिए समस्त
वायुकोषों को। फेफड़ों और हृदय के
करोड़ों वायुकोषों तक श्वास
द्वारा हवा नहीं पहुँच पाने के
कारण वे निढाल से ही पड़े रहते हैं।
उनका कोई उपयोग नहीं हो
पाता।
उक्त वायुकोषों तक प्राणायाम
द्वारा प्राणवायु मिलने से
कोशिकाओं की रोगों से लड़ने की
शक्ति बढ़ जाती है, नए रक्त का
निर्माण होता है और सभी
नाड़ियाँ हरकत में आने लगती हैं।
छोटे-छोटे नए टिश्यू बनने लगते हैं।
उनकी वजह से चमड़ी और त्वचा में
निखार और तरोताजापन आने
लगता है।
तो सभी तरह के प्राणायाम को
नियमित करना आवश्यक है।
मौन ध्यान : भृकुटी पर ध्यान
लगाकर निरंतर मध्य स्थित अँधेरे
को देखते रहें और यह भी जानते रहें
कि श्वास अंदर और बाहर हो
रही है। मौन ध्यान और साधना
मन और शरीर को मजबूत तो करती
ही है, मध्य स्थित जो अँधेरा है
वही काले से नीला और नीले से
सफेद में बदलता जाता है। सभी के
साथ अलग-अलग परिस्थितियाँ
निर्मित हो सकती हैं।
मौन से मन की क्षमता का विकास
होता जाता है जिससे काल्पनिक
शक्ति और आभास करने की क्षमता
बढ़ती है। इसी के माध्यम से
पूर्वाभास और साथ ही इससे
भविष्य के गर्भ में झाँकने की
क्षमता भी बढ़ती है। यही सिक्स्थ
सेंस के विकास की शुरुआत है।
अंतत: हमारे पीछे कोई चल रहा है
या दरवाजे पर कोई खड़ा है, इस
बात का हमें आभास होता है। यही
आभास होने की क्षमता हमारी
छठी इंद्री के होने की सूचना है।
जब यह आभास होने की क्षमता
बढ़ती है तो पूर्वाभास में बदल
जाती है। मन की स्थिरता और
उसकी शक्ति ही छठी इंद्री के
विकास में सहायक सिद्ध होती ह
विषयों - रूप, रस, गंध, स्पर्श एवं
शब्द - का तथा आभ्यंतर विषयों -
सु:ख दु:ख आदि-का ज्ञान प्राप्त
होता है। इद्रियों के अभाव में हम
विषयों का ज्ञान किसी प्रकार
प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए
तर्कभाषा के अनुसार इंद्रिय वह
प्रमेय है जो शरीर से संयुक्त,
अतींद्रिय (इंद्रियों से ग्रहीत न
होनेवाला) तथा ज्ञान का करण
हो (शरीरसंयुक्तं ज्ञानं
करणमतींद्रियम्)।
न्याय के अनुसार इंद्रियाँ दो
प्रकार की होती हैं :
(1) बहिरिंद्रिय - घ्राण, रसना,
चक्षु, त्वक् तथा श्रोत्र (पाँच) और
(2) अंतरिंद्रिय - केवल मन (एक)।
इनमें बाह्य इंद्रियाँ क्रमश: गंध,
रस, रूप स्पर्श तथा शब्द की
उपलब्धि मन के द्वारा होती हैं।
सुख दु:ख आदि भीतरी विषय हैं।
इनकी उपलब्धि मन के द्वारा
होती है। मन हृदय के भीतर
रहनेवाला तथा अणु परमाणु से युक्त
माना जाता है। इंद्रियों की
सत्ता का बोध प्रमाण, अनुमान से
होता है, प्रत्यक्ष से नहीं सांख्य के
अनुसार इंद्रियाँ संख्या में एकादश
मानी जाती हैं जिनमें
ज्ञानेंद्रियाँ तथा कर्मेंद्रियाँ
पाँच पाँच मानी जाती हैं।
ज्ञानेंद्रियाँ पूर्वोक्त पाँच हैं,
कर्मेंद्रियाँ मुख, हाथ, पैर,
मलद्वार तथा जननेंद्रिय हैं जो
क्रमश: बोलने, ग्रहण करने, चलने,
मल त्यागने तथा संतानोत्पादन
का कार्य करती है।
संकल्पविकल्पात्मक मन ग्यारहवीं
इंद्रिय माना जाता है।
छठी इन्द्रिय कैसे जगाये
छठी इंद्री को अंग्रेजी में सिक्स्थ
सेंस कहते हैं। सिक्स्थ सेंस को
जाग्रत करने के लिए योग में अनेक
उपाय बताए गए हैं। इसे
परामनोविज्ञान का विषय भी
माना जाता है। असल में यह संवेदी
बोध का मामला है। गहरे ध्यान
प्रयोग से यह स्वत: ही जाग्रत
हो जाती है।
कहते हैं कि पाँच इंद्रियाँ होती
हैं- नेत्र, नाक, जीभ, कान और
यौन। इसी को दृश्य, सुगंध, स्वाद,
श्रवण और स्पर्श कहा जाता है।
किंतु एक और छठी इंद्री भी होती
है जो दिखाई नहीं देती, लेकिन
उसका अस्तित्व महसूस होता है।
वह मन का केंद्रबिंदु भी हो सकता
है या भृकुटी के मध्य स्थित आज्ञा
चक्र जहाँ सुषुन्मा नाड़ी स्थित है।
सिक्स्थ सेंस के कई किस्से-
कहानियाँ किताबों में भरे पड़े हैं।
इस ज्ञान पर कई तरह की फिल्में
भी बन चुकी हैं और उपन्यासकारों
ने इस पर उपन्यास भी लिखे हैं।
प्राचीनकाल या मध्यकाल में छठी
इंद्री ज्ञान प्राप्त कई लोग हुआ
करते थे, लेकिन आज कहीं भी दिखाई
नहीं देते तो उसके भी कई कारण हैं।
मेस्मेरिज्म या हिप्नोटिज्म जैसी
अनेक विद्याएँ इस छठी इंद्री के
जाग्रत होने का ही कमाल होता
है। हम आपको बताना चाहते हैं कि
छठी इंद्री क्या होती है और योग
द्वारा इसकी शक्ति कैसे हासिल
की जा सकती है और यह भी कि
जीवन में हम इसका इस्तेमाल किस
तरह कर सकते हैं।
क्या है छठी इंद्री : मस्तिष्क के
भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र है,
उसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं, वहीं से
सुषुन्मा रीढ़ से होती हुई मूलाधार
तक गई है। सुषुन्मा नाड़ी जुड़ी है
सहस्रकार से।
इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ
स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं
तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र
स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य
स्वर स्थित रहता है। सुषुम्ना मध्य
में स्थित है, अतः जब हमारे दोनों
स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि
सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है। इस
सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस
जाग्रत होता है।
इड़ा, पिंगला और सुषुन्मा के
अलावा पूरे शरीर में हजारों
नाड़ियाँ होती हैं। उक्त सभी
नाड़ियों का शुद्धि और
सशक्तिकरण सिर्फ प्राणायाम और
आसनों से ही होता है। शुद्धि और
सशक्तिकरण के बाद ही उक्त
नाड़ियों की शक्ति को जाग्रत
किया जा सकता है।
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छठी इंद्री के जाग्रत होने से क्या
होगा : व्यक्ति में भविष्य में झाँकने
की क्षमता का विकास होता है।
अतीत में जाकर घटना की सच्चाई
का पता लगाया जा सकता है।
मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन
सकते हैं। किसके मन में क्या विचार
चल रहा है इसका शब्दश: पता लग
जाता है। एक ही जगह बैठे हुए
दुनिया की किसी भी जगह की
जानकारी पल में ही हासिल की
जा सकती है। छठी इंद्री प्राप्त
व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह
सकता और इसकी क्षमताओं के
विकास की संभावनाएँ अनंत हैं।
कैसे जाग्रत करें छठी इंद्री : यह
इंद्री सभी में सुप्तावस्था में होती
है। भृकुटी के मध्य निरंतर और
नियमित ध्यान करते रहने से
आज्ञाचक्र जाग्रत होने लगता है
जो हमारे सिक्स्थ सेंस को बढ़ाता
है। योग में त्राटक और ध्यान की
कई विधियाँ बताई गई हैं। उनमें से
किसी भी एक को चुनकर आप इसका
अभ्यास कर सकते हैं।
शांत-स्वच्छ वातावरण : अभ्यास के
लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और
स्वच्छ वातावरण, जहाँ फेफड़ों में
ताजी हवा भरी जा सके अन्यथा
आगे नहीं बढ़ा जा सकता। शहर का
वातावरण कुछ भी लाभदायक नहीं
है, क्योंकि उसमें शोर, धूल, धुएँ के
अलावा जहरीले पदार्थ और
कार्बन डॉक्साइट निरंतर आपके
शरीर और मन का क्षरण करती
रहती है।
प्राणायाम का अभ्यास :
वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग का
सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा
ही काम करता है। हम ऐसे पोषक
तत्व ग्रहण नहीं करते जो मस्तिष्क
को लाभ पहुँचा सकें, तब
प्राणायाम ही एकमात्र उपाय
बच जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम
जाग्रत करना चाहिए समस्त
वायुकोषों को। फेफड़ों और हृदय के
करोड़ों वायुकोषों तक श्वास
द्वारा हवा नहीं पहुँच पाने के
कारण वे निढाल से ही पड़े रहते हैं।
उनका कोई उपयोग नहीं हो
पाता।
उक्त वायुकोषों तक प्राणायाम
द्वारा प्राणवायु मिलने से
कोशिकाओं की रोगों से लड़ने की
शक्ति बढ़ जाती है, नए रक्त का
निर्माण होता है और सभी
नाड़ियाँ हरकत में आने लगती हैं।
छोटे-छोटे नए टिश्यू बनने लगते हैं।
उनकी वजह से चमड़ी और त्वचा में
निखार और तरोताजापन आने
लगता है।
तो सभी तरह के प्राणायाम को
नियमित करना आवश्यक है।
मौन ध्यान : भृकुटी पर ध्यान
लगाकर निरंतर मध्य स्थित अँधेरे
को देखते रहें और यह भी जानते रहें
कि श्वास अंदर और बाहर हो
रही है। मौन ध्यान और साधना
मन और शरीर को मजबूत तो करती
ही है, मध्य स्थित जो अँधेरा है
वही काले से नीला और नीले से
सफेद में बदलता जाता है। सभी के
साथ अलग-अलग परिस्थितियाँ
निर्मित हो सकती हैं।
मौन से मन की क्षमता का विकास
होता जाता है जिससे काल्पनिक
शक्ति और आभास करने की क्षमता
बढ़ती है। इसी के माध्यम से
पूर्वाभास और साथ ही इससे
भविष्य के गर्भ में झाँकने की
क्षमता भी बढ़ती है। यही सिक्स्थ
सेंस के विकास की शुरुआत है।
अंतत: हमारे पीछे कोई चल रहा है
या दरवाजे पर कोई खड़ा है, इस
बात का हमें आभास होता है। यही
आभास होने की क्षमता हमारी
छठी इंद्री के होने की सूचना है।
जब यह आभास होने की क्षमता
बढ़ती है तो पूर्वाभास में बदल
जाती है। मन की स्थिरता और
उसकी शक्ति ही छठी इंद्री के
विकास में सहायक सिद्ध होती ह
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