सम्पूर्ण चाणक्य नीति के 604 अनमोल विचार chanakya niti quotes in hindi
आचार्य
चाणक्य के
अनमोल
विचार और
कथन :-
कामयाब
होने के लिए
और ज्यादा
कामियाब होने के
लिए अच्छे शत्रुओ
की आवश्यकता
होती है
2: वन की अग्नि
चन्दन की लकड़ी
को भी जला देती
है अर्थात दुष्ट
व्यक्ति किसी का
भी अहित कर
सकते है।
3: शत्रु की
दुर्बलता जानने
तक उसे अपना
मित्र बनाए रखें।
4: सिंह भूखा होने
पर भी तिनका
नहीं खाता।
5: एक ही देश के
दो शत्रु परस्पर
मित्र होते है।
6: आपातकाल में
स्नेह करने वाला
ही मित्र होता
है।
7: मित्रों के
संग्रह से बल
प्राप्त होता है।
8: जो धैर्यवान
नहीं है, उसका न
वर्तमान है न
भविष्य।
9: संकट में बुद्धि
ही काम आती है।
10: लोहे को लोहे
से ही काटना
चाहिए।
11: यदि माता
दुष्ट है तो उसे भी
त्याग देना
चाहिए।
12: यदि स्वयं के
हाथ में विष फ़ैल
रहा है तो उसे
काट देना
चाहिए।
13: सांप को दूध
पिलाने से विष
ही बढ़ता है, न
की अमृत।
14: एक बिगड़ैल
गाय सौ कुत्तों से
ज्यादा श्रेष्ठ है।
अर्थात एक
विपरीत
स्वाभाव का परम
हितैषी व्यक्ति,
उन सौ लोगों से
श्रेष्ठ है जो
आपकी चापलूसी
करते है।
15: कल के मोर से
आज का कबूतर
भला। अर्थात
संतोष सब बड़ा
धन है।
16: आग सिर में
स्थापित करने पर
भी जलाती है।
अर्थात दुष्ट
व्यक्ति का
कितना भी
सम्मान कर लें,वह
सदा दुःख ही
देता है।
17: अन्न के
सिवाय कोई
दूसरा धन नहीं है।
18: भूख के समान
कोई दूसरा शत्रु
नहीं है।
19: विद्या ही
निर्धन का धन है।
20: विद्या को
चोर भी नहीं
चुरा सकता।
21: शत्रु के गुण को
भी ग्रहण करना
चाहिए।
22: अपने स्थान
पर बने रहने से ही
मनुष्य पूजा जाता
है।
23: सभी प्रकार
के भय से बदनामी
का भय सबसे बड़ा
होता है।
24: किसी लक्ष्य
की सिद्धि में
कभी शत्रु का
साथ न करें।
25: आलसी का न
वर्तमान होता
है, न भविष्य।
26: सोने के साथ
मिलकर चांदी भी
सोने जैसी दिखाई
पड़ती है अर्थात
सत्संग का प्रभाव
मनुष्य पर अवश्य
पड़ता है।
27: ढेकुली नीचे
सिर झुकाकर ही
कुँए से जल
निकालती है।
अर्थात कपटी या
पापी व्यक्ति
सदैव मधुर वचन
बोलकर अपना
काम निकालते है।
28: सत्य भी यदि
अनुचित है तो उसे
नहीं कहना
चाहिए।
29: समय का
ध्यान नहीं रखने
वाला व्यक्ति
अपने जीवन में
निर्विघ्न नहीं
रहता।
30: जो जिस
कार्ये में कुशल हो
उसे उसी कार्ये में
लगना चाहिए।
31: दोषहीन
कार्यों का होना
दुर्लभ होता है।
32: किसी भी
कार्य में पल भर
का भी विलम्ब न
करें।
33: चंचल चित
वाले के कार्य
कभी समाप्त नहीं
होते।
34: पहले निश्चय
करिएँ, फिर
कार्य आरम्भ करें।
35: भाग्य
पुरुषार्थी के पीछे
चलता है।
36: अर्थ, धर्म और
कर्म का आधार है।
37: शत्रु
दण्डनीति के ही
योग्य है।
38: कठोर वाणी
अग्निदाह से भी
अधिक तीव्र दुःख
पहुंचाती है।
39: व्यसनी
व्यक्ति कभी सफल
नहीं हो सकता।
40: शक्तिशाली
शत्रु को कमजोर
समझकर ही उस
पर आक्रमण करे।
41: अपने से अधिक
शक्तिशाली और
समान बल वाले से
शत्रुता न करे।
42: मंत्रणा को
गुप्त रखने से ही
कार्य सिद्ध
होता है।
43: योग्य
सहायकों के बिना
निर्णय करना
बड़ा कठिन होता
है।
44: एक अकेला
पहिया नहीं चला
करता।
45: अविनीत
स्वामी के होने से
तो स्वामी का न
होना अच्छा है।
46: जिसकी आत्मा
संयमित होती है,
वही आत्मविजयी
होता है।
47: स्वभाव का
अतिक्रमण अत्यंत
कठिन है।
48: धूर्त व्यक्ति
अपने स्वार्थ के
लिए दूसरों की
सेवा करते हैं।
49: कल की हज़ार
कौड़ियों से आज
की एक कौड़ी
भली। अर्थात
संतोष सबसे बड़ा
धन है।
50: दुष्ट स्त्री
बुद्धिमान
व्यक्ति के शरीर
को भी निर्बल
बना देती है।
51: आग में आग नहीं
डालनी चाहिए।
अर्थात क्रोधी
व्यक्ति को अधिक
क्रोध नहीं
दिलाना चाहिए।
52: मनुष्य की
वाणी ही विष
और अमृत की खान
है।
53: दुष्ट की
मित्रता से शत्रु
की मित्रता
अच्छी होती है।
54: दूध के लिए
हथिनी पालने की
जरुरत नहीं
होती। अर्थात
आवश्कयता के
अनुसार साधन
जुटाने चाहिए।
55: कठिन समय के
लिए धन की
रक्षा करनी
चाहिए।
56: कल का कार्य
आज ही कर ले।
57: सुख का आधार
धर्म है।
58: धर्म का
आधार अर्थ
अर्थात धन है।
59: अर्थ का
आधार राज्य है।
60: राज्य का
आधार अपनी
इन्द्रियों पर
विजय पाना है।
61: प्रकृति (सहज)
रूप से प्रजा के
संपन्न होने से
नेताविहीन
राज्य भी
संचालित होता
रहता है।
62: वृद्धजन की
सेवा ही विनय
का आधार है।
63: वृद्ध सेवा
अर्थात
ज्ञानियों की
सेवा से ही ज्ञान
प्राप्त होता है।
64: ज्ञान से
राजा अपनी
आत्मा का
परिष्कार करता
है, सम्पादन
करता है।
65: आत्मविजयी
सभी प्रकार की
संपत्ति एकत्र
करने में समर्थ
होता है।
66: जहां लक्ष्मी
(धन) का निवास
होता है, वहां
सहज ही सुख-
सम्पदा आ जुड़ती
है।
67: इन्द्रियों पर
विजय का आधार
विनर्मता है।
68: प्रकर्ति का
कोप सभी कोपों
से बड़ा होता है।
69: शासक को
स्वयं योगय बनकर
योगय प्रशासकों
की सहायता से
शासन करना
चाहिए।
70: योग्य
सहायकों के बिना
निर्णय करना
बड़ा कठिन होता
है।
71: एक अकेला
पहिया नहीं चला
करता।
72: सुख और दुःख में
सामान रूप से
सहायक होना
चाहिए।
73: स्वाभिमानी
व्यक्ति प्रतिकूल
विचारों
कोसम्मुख रखकर
दुबारा उन पर
विचार करे।
74: अविनीत
व्यक्ति को स्नेही
होने पर भी
मंत्रणा में नहीं
रखना चाहिए।
75: शासक को
स्वयं योग्य बनकर
योग्य प्रशासकों
की सहायता से
शासन करना
चाहिए।
76: सुख और दुःख में
समान रूप से
सहायक होना
चाहिए।
77: स्वाभिमानी
व्यक्ति प्रतिकूल
विचारों को
सम्मुख रखकर
दोबारा उन पर
विचार करे।
78: अविनीत
व्यक
चाणक्य के
अनमोल
विचार और
कथन :-
कामयाब
होने के लिए
और ज्यादा
कामियाब होने के
लिए अच्छे शत्रुओ
की आवश्यकता
होती है
2: वन की अग्नि
चन्दन की लकड़ी
को भी जला देती
है अर्थात दुष्ट
व्यक्ति किसी का
भी अहित कर
सकते है।
3: शत्रु की
दुर्बलता जानने
तक उसे अपना
मित्र बनाए रखें।
4: सिंह भूखा होने
पर भी तिनका
नहीं खाता।
5: एक ही देश के
दो शत्रु परस्पर
मित्र होते है।
6: आपातकाल में
स्नेह करने वाला
ही मित्र होता
है।
7: मित्रों के
संग्रह से बल
प्राप्त होता है।
8: जो धैर्यवान
नहीं है, उसका न
वर्तमान है न
भविष्य।
9: संकट में बुद्धि
ही काम आती है।
10: लोहे को लोहे
से ही काटना
चाहिए।
11: यदि माता
दुष्ट है तो उसे भी
त्याग देना
चाहिए।
12: यदि स्वयं के
हाथ में विष फ़ैल
रहा है तो उसे
काट देना
चाहिए।
13: सांप को दूध
पिलाने से विष
ही बढ़ता है, न
की अमृत।
14: एक बिगड़ैल
गाय सौ कुत्तों से
ज्यादा श्रेष्ठ है।
अर्थात एक
विपरीत
स्वाभाव का परम
हितैषी व्यक्ति,
उन सौ लोगों से
श्रेष्ठ है जो
आपकी चापलूसी
करते है।
15: कल के मोर से
आज का कबूतर
भला। अर्थात
संतोष सब बड़ा
धन है।
16: आग सिर में
स्थापित करने पर
भी जलाती है।
अर्थात दुष्ट
व्यक्ति का
कितना भी
सम्मान कर लें,वह
सदा दुःख ही
देता है।
17: अन्न के
सिवाय कोई
दूसरा धन नहीं है।
18: भूख के समान
कोई दूसरा शत्रु
नहीं है।
19: विद्या ही
निर्धन का धन है।
20: विद्या को
चोर भी नहीं
चुरा सकता।
21: शत्रु के गुण को
भी ग्रहण करना
चाहिए।
22: अपने स्थान
पर बने रहने से ही
मनुष्य पूजा जाता
है।
23: सभी प्रकार
के भय से बदनामी
का भय सबसे बड़ा
होता है।
24: किसी लक्ष्य
की सिद्धि में
कभी शत्रु का
साथ न करें।
25: आलसी का न
वर्तमान होता
है, न भविष्य।
26: सोने के साथ
मिलकर चांदी भी
सोने जैसी दिखाई
पड़ती है अर्थात
सत्संग का प्रभाव
मनुष्य पर अवश्य
पड़ता है।
27: ढेकुली नीचे
सिर झुकाकर ही
कुँए से जल
निकालती है।
अर्थात कपटी या
पापी व्यक्ति
सदैव मधुर वचन
बोलकर अपना
काम निकालते है।
28: सत्य भी यदि
अनुचित है तो उसे
नहीं कहना
चाहिए।
29: समय का
ध्यान नहीं रखने
वाला व्यक्ति
अपने जीवन में
निर्विघ्न नहीं
रहता।
30: जो जिस
कार्ये में कुशल हो
उसे उसी कार्ये में
लगना चाहिए।
31: दोषहीन
कार्यों का होना
दुर्लभ होता है।
32: किसी भी
कार्य में पल भर
का भी विलम्ब न
करें।
33: चंचल चित
वाले के कार्य
कभी समाप्त नहीं
होते।
34: पहले निश्चय
करिएँ, फिर
कार्य आरम्भ करें।
35: भाग्य
पुरुषार्थी के पीछे
चलता है।
36: अर्थ, धर्म और
कर्म का आधार है।
37: शत्रु
दण्डनीति के ही
योग्य है।
38: कठोर वाणी
अग्निदाह से भी
अधिक तीव्र दुःख
पहुंचाती है।
39: व्यसनी
व्यक्ति कभी सफल
नहीं हो सकता।
40: शक्तिशाली
शत्रु को कमजोर
समझकर ही उस
पर आक्रमण करे।
41: अपने से अधिक
शक्तिशाली और
समान बल वाले से
शत्रुता न करे।
42: मंत्रणा को
गुप्त रखने से ही
कार्य सिद्ध
होता है।
43: योग्य
सहायकों के बिना
निर्णय करना
बड़ा कठिन होता
है।
44: एक अकेला
पहिया नहीं चला
करता।
45: अविनीत
स्वामी के होने से
तो स्वामी का न
होना अच्छा है।
46: जिसकी आत्मा
संयमित होती है,
वही आत्मविजयी
होता है।
47: स्वभाव का
अतिक्रमण अत्यंत
कठिन है।
48: धूर्त व्यक्ति
अपने स्वार्थ के
लिए दूसरों की
सेवा करते हैं।
49: कल की हज़ार
कौड़ियों से आज
की एक कौड़ी
भली। अर्थात
संतोष सबसे बड़ा
धन है।
50: दुष्ट स्त्री
बुद्धिमान
व्यक्ति के शरीर
को भी निर्बल
बना देती है।
51: आग में आग नहीं
डालनी चाहिए।
अर्थात क्रोधी
व्यक्ति को अधिक
क्रोध नहीं
दिलाना चाहिए।
52: मनुष्य की
वाणी ही विष
और अमृत की खान
है।
53: दुष्ट की
मित्रता से शत्रु
की मित्रता
अच्छी होती है।
54: दूध के लिए
हथिनी पालने की
जरुरत नहीं
होती। अर्थात
आवश्कयता के
अनुसार साधन
जुटाने चाहिए।
55: कठिन समय के
लिए धन की
रक्षा करनी
चाहिए।
56: कल का कार्य
आज ही कर ले।
57: सुख का आधार
धर्म है।
58: धर्म का
आधार अर्थ
अर्थात धन है।
59: अर्थ का
आधार राज्य है।
60: राज्य का
आधार अपनी
इन्द्रियों पर
विजय पाना है।
61: प्रकृति (सहज)
रूप से प्रजा के
संपन्न होने से
नेताविहीन
राज्य भी
संचालित होता
रहता है।
62: वृद्धजन की
सेवा ही विनय
का आधार है।
63: वृद्ध सेवा
अर्थात
ज्ञानियों की
सेवा से ही ज्ञान
प्राप्त होता है।
64: ज्ञान से
राजा अपनी
आत्मा का
परिष्कार करता
है, सम्पादन
करता है।
65: आत्मविजयी
सभी प्रकार की
संपत्ति एकत्र
करने में समर्थ
होता है।
66: जहां लक्ष्मी
(धन) का निवास
होता है, वहां
सहज ही सुख-
सम्पदा आ जुड़ती
है।
67: इन्द्रियों पर
विजय का आधार
विनर्मता है।
68: प्रकर्ति का
कोप सभी कोपों
से बड़ा होता है।
69: शासक को
स्वयं योगय बनकर
योगय प्रशासकों
की सहायता से
शासन करना
चाहिए।
70: योग्य
सहायकों के बिना
निर्णय करना
बड़ा कठिन होता
है।
71: एक अकेला
पहिया नहीं चला
करता।
72: सुख और दुःख में
सामान रूप से
सहायक होना
चाहिए।
73: स्वाभिमानी
व्यक्ति प्रतिकूल
विचारों
कोसम्मुख रखकर
दुबारा उन पर
विचार करे।
74: अविनीत
व्यक्ति को स्नेही
होने पर भी
मंत्रणा में नहीं
रखना चाहिए।
75: शासक को
स्वयं योग्य बनकर
योग्य प्रशासकों
की सहायता से
शासन करना
चाहिए।
76: सुख और दुःख में
समान रूप से
सहायक होना
चाहिए।
77: स्वाभिमानी
व्यक्ति प्रतिकूल
विचारों को
सम्मुख रखकर
दोबारा उन पर
विचार करे।
78: अविनीत
व्यक
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